छुपा कर दर्द अपना चैन ओ सकूं खो जाऊंगा करके तुम अब बदनाम दिया आस का कभी बुझा जाओगे
मेरी बरबादियों ने घुट घुट के जीना सिखा दिया और देकर हमें तू दर्द बार बार फासला कभी बढ़ा जाओगे
हुआ जीना आसान कब बदनसीबों का देकर ताने हजार बढ़ा कर बेरुखी मुझसे सजा कभी सुना जाओगे
छीन कर हक जीने का मुझसे अच्छा ना किया तुमने बुझा कर चिराग़ ए दिल मेरा दर्द कभी बढ़ा जाओगे
दौर ए मुसीबत में अपना कोई जल्दी मिलता कहां करके तुम ही फैसला खिलाफ मेरे बेरुखी बढ़ा जाओगे
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