बुझा कर चिराग़ ए दिल हुनर जीने का सीखना पड़ा हमें चल कर कांटों के राह पर हुआ जो दर्द अब सोचना पड़ा
जी कर मुफलिसी में मिला चैन ओ सकूं कब किसी को बिखर कर सामने तेरे तराना ए बेचैन दिल अब बताना पड़ा
बढ़ा के बेकरारी सौदा करते नहीं समझाना पड़ा करके कोशिश तमाम बात दिल की अपनी सच क्या है बताना पड़ा
दिल है कि मानता नहीं चिरागों से दिल बहलाना पड़ा दर्द हमें बेशुमार देने वाले होकर मायूस फासला बढ़ाना पड़ा
समझा के बेचैन दिल को चिराग़ ए दिल कितनी बार बुझाए हैं करना भरोसा अब आसान नहीं अरमां मिटाना पड़ा
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