आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए बेचैन तमन्ना

                
                                                         
                            उम्मीद मेरी कहीं और बट नहीं सकती हमने सीखा है अंधेरों में जीना सोच मेरी कहीं और ठहर नहीं सकती
                                                                 
                            
देख के लाचारी मेरी मुंह मोड़ लिया तुमने करो लाख जुल्म मुझ पर मगर ये सोच मेरी कभी बदल नहीं सकती
तू कब हुआ मेरा ये तो बता सितम मोहब्बत में हो सकती जरूर मगर हद से ज्यादा जुल्म भी ठहर नहीं सकती
दर्द मेरा और बढ़ाने वाले मिला है कुछ क्या तुम्हें करके कोशिशें नाकाम तमन्ना मेरी भी कभी बिखर नही सकती
अब और न दर्द बढ़ा तू मेरा कुछ तो रहम कर हालांकि अरमान मेरा पास गया तेरे मगर सच्चाई मर नहीं सकती
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर