देख कर धूप कड़ी सफर में ये सोचता हूं छांव मिल जाए कभी धूप भी सारा समंदर ही पी ना जाए कहीं
मैं तो खुद को मरता हुआ देखना चाहता हूं मगर डर भी है बहुत तुमको भी सच खबर लग ना जाए कहीं
चला था मैं तुमसे रूठ कर मगर दिल धड़का है इस बार ये रस्ता मुझे कभी फिर तेरे दर पे ले ना जाए कहीं
है हवा का शोर मगर दिखा बादल नहीं डर ये भांप कर मिजाज़ मौसम का दिल तेरा बदल ना जाए कहीं
है गरज मेरा तुमसे गुफ्तगू करना एहसान तेरा मुझ पर है डर ये बढ़ा कर फासला हमें भूल ना जाए कहीं
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