जी कर अंधेरों में मिला चैन कब किसी को कहूं कैसे आदमी ही आदमी से है जुदा ये सच सोचना पड़ा हम ही को
तेरी मर्जी के मुताबिक दर्द सहना पड़ा है अब ना रहे हम किसी काम के मिटा अरमां सारे सोचना पड़ा हम ही को
बदल कर मिजाज़ किया जुल्म ओ सितम आपने मिटा के अब अरमां सारे अंजाम तो सारा सहना पड़ा हम ही को
गर तुम्हें हम मंजूर नहीं तो क्या करें वक्त ए रुखसत जान कर अंदाज़ तेरा होकर मायूस भटकना पड़ा हम ही को
यूं तो मिले हैं राह ए वफा हमें कई लोग मगर ये मजबूरी कैसी रूठ कर खुद से अब बिछड़ना पड़ा है हम ही को
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