गर बिन मांगे किसी को मिला सब कुछ तो ख्वाहिश भी फिजूल है सूरज से रौशनी की गुजारिश भी फिजूल है
किसने कहा आपसे दरिया पार करो टूटी हुई कस्ती पे सच तो ये दरिया से आपकी गुजारिश भी फिजूल है
तेरी मर्जी के खिलाफ हो सकता नही अपनी मौत की तैयारी में हूं होकर अब मजबूर तेरी साजिश कुबूल है
ऐ आसमां मुझको तेरी इनायत की कोई जरूरत नहीं जी लेने दे हमें चैन ओ सकूं से तेरी नुमाइश फिजूल है
जी करता है कह दूं ज़माने से मंजिल चाहता हूं मगर तू मिलता ही नहीं होकर मजबूर सिफारिश फिजूल है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X