नारी ने नारीत्व से
प्रेम को सृजित किया ।
निराकार प्रेम को
साकार में रचित किया ।
करुणा के स्वरूप को
ममता में जनित्र किया ।।
दिव्यता,औजस्विता
सौन्दर्यता , सृजन्यता
विलीन कर स्वयं को
प्रतिरूप रच दिया ।
धरणी रूप धार के
मनुष्य-पुत्र रच दिया । ।
रक्त को वात्सल्य से
दुग्ध में बदल दिया ।
अपने दुग्धपान से
पुत्र-तन पुष्ट किया । ।
पुत्र प्रेम के अधीन
सौन्दर्य राग तज दिया ।
सत्य शिव सुन्दरं
विवेक ज्ञान प्रदत्त किया । ।
बाल्य रूप पार कर
युवक जब बलिष्ठ हुआ ।
अहं क्रोध वासना से
पूर्णतः फलित हुआ। ।
नारीत्व मातृ रूप से
नव यौवना में ढल गयी ।
दर्द को मिटाने को अब
संगिनी वो बन गई । ।
काम क्रोध द्वेष से
विवेक पूर्ण नष्ट हुआ ।
मन वचन आचरण
पूर्णतः भ्रष्ट हुआ । ।
अहं की तृप्ति को
नारी का मर्दन किया ।
दुग्धपान का स्रोत
बना कभी था वो तन
आज उसने बनके वहशी
नारीत्व का दमन किया । ।
आत्मा पे चोट कर
तन को यू कुचल दिया ।
सुगन्ध की कली को
हाथ से मसल दिया । ।
घृणित विभत्स कृत्य का
आगमन ना हो कभी ।
आओ मिलकर ले शपथ
मरे ना निर्भया फिर कभी ।।
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