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तुझे याद आना चाहती हूं

                
                                                         
                            तुझे याद आना चाहती हूं
                                                                 
                            

थक गई याद करके तुझे, अब तुझे याद आना चाहती हूं,
बहुत किया रकीबों के हवाले, अब तुझे मैं पाना चाहती हूं।

भर लो आगोश में अपनी कि करार आ जाए इस दिल को,
शब-ए-हिज़्रा को मैं अपनी अब रंगीन बनाना चाहती हूं।

मयकदे की ज़रूरत होगी तुझे, मेरी मय के सागर तुम हो,
बना कर के मय तुझे, मैं अपने होंठों से लगाना चाहती हूं।

ना खाया करो झूठी कसमें हमारी, मर गए हम तो पछताओगे,
बहुत सताया तुमने तोड़ कर वादा,अब मैं तुम्हें सताना चाहती हूं।

बहुत तरसाया तूने प्रेम के दिल को, जलती रही विरह अगन में,
जला कर विरह अगन में अब तुझे भी मैं तड़पाना चाहती हूं।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)
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3 वर्ष पहले

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