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छलकते आंसू

                
                                                         
                            वो इस कदर दिल में बस गया था, कि दिल छोड़ मुझे उसी का हो गया था,
                                                                 
                            
छोड़ कर जब चला गया वो,ज़माने ने देखा कि आंसुओं में बह गया था।

मगर हकीकत तो कुछ और है यारो वो थोड़ा सा कहीं रह गया था,
आंसूओं के संग तो मेरा अपना- आपा बह गया था।

की बहुत कोशिश कि आंसुओं को बहा कर के सैलाब ला दूं,
बस एक ही बार में रो लूं जी भर कर, और इन आंसुओं में उसे बहा दूं।

रोती रही ज़ार-ओ- ज़ार ता-उम्र मैं, बैठी रही चौखट पर ता- उम्र उसके इंतजार में,
ना बहा सकी उसे इक भी आंसू में लाख की कोशिश उसे दिल से निकाल दूं।

हर दिन तकी राह उसकी, हर शब काटी उसके इंतजार में,
कोई तो पूछे हाल मेरा किस तरह कटी मेरी शब हिज़्र-ओ-विसाल में।

तन्हाई सी जब उन्हें पसंद है, उन्हीं की पसंद को अपनाना होगा,
सी कर लबों को,रहकर अंधेरों में आंसू बहाना होगा,
रहकर दूर उनकी याद में ही वक्त बिताना होगा।

जाते-जाते बता जाते रूख़सत की वजह, मान जाते
हम गुनाह अपना, यूं बेवजह हम आंसू ना बहाते।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)

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4 वर्ष पहले

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