सर्द रातें
पूस की सर्द रातों में विसाल-ए-यार जो हो जाएं,
कसम से ये ज़मीं जैसे जन्नत का ख्वाब हो जाए,
हाथ में मेरे जब मेरे सनम का हाथ आ जाए,
करूं दुआ खुदा से ये सर्द रात यूं हीं थम जाएं,
ना हो जब दीदार-ए-यार किस तरह हम बताएं,
एक तो जुदाई उसपर सर्द रातें कितना कहर ढाएं,
सिमटने को आगोश में सनम की दिल कसमसाए,
ये दर्द है ऐसा जो कहा भी ना जए, सहा भी न जाए,
जाते दिसम्बर सी कहीं ये सर्द रात भी ना चली जाए,
कोई तो हो जो सनम से मिलन का करे कोई उपाय,
कोई बने संदेशवाहक पिया तक मेरा संदेश पहुंचाए,
पिया मिलन अगन में तन-मन मेरा जला-जला जाए,
इस सर्द रात में लब तेरे लबों की मय को तरस जाए,
मयखाने की मय भी आज कुछ असर ना दिखाए,
हो रहे हैं बेकरार, यार आए तो लबों की मय पिलाए,
भर-भर के जाम आज आंखों के हम छलकाएं,
सुन कर आहट उसके कदमों की जिया धड़क जाए,
थम गई सांसें जब हम यार की आगोश में समाए,
नहीं फिक्र अब कोई चाहे जान ही चली जाए,
यार ही है खुदा मेरा, खुदा ही मेरा यार कहलाए।
प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)
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