सुनो सुनाऊं तुम्हें सात फेरों की कहानी, जिसमें पति बनता राजा और पत्नी बनती रानी,
पहला साल वचनों में गुजरता मीठी और सुन्दर, सुरीली बनती दोनों की कहानी।
ज़मीं पर पांव ना रखना, मैले ना हो जाए दूध सा सफेद बदन तुम्हारा,
चांद सितारे तोड़ के ला दूं, तू जो करे एक इशारा।
दूजे साल में आता मुन्ना थोड़ी दूरी लाता मुन्ना,
ला के दूध का पाउडर थक गया मैं, कितना दूध है पीता मुन्ना।
तीसरे साल खिलौने लाता, मार ताने बीवी को सुनाता,
कितने महंगे खिलौने हो गए आधे पैसे खर्च इन पर हो गए।
चौथे साल स्कूल का एडमिशन, हो गया झगड़ा कौन करेगा यह सब खिट-पिट,
जाकर खुद एडमिशन कराओ, मेरा ना तुम दिमाग खाओ,
मुझको है काम बहुतेरे, नहीं रहते हम तुम जैसे वेले।
पांचवी साल में गुड़िया आ गई, छटे साल तनख्वाह और भी कम पड़ गई,
सातवें साल में, मुन्ने की मम्मी तू कितनी है निकम्मी,
सारा दिन घर खाली रहती, दो बच्चे को पाल ना पाती,
मेरा मेरा तुझ संग नहीं गुजारा, कर लूंगा मैं तुझसे किनारा,
नित नई डिमांड तेरी, कहां से मैं करूं पूरी, जाकर अपनी मां से लाओ मेरा तुम दिमाग ना खाओ।
नहीं खिट-पिट और चाहिए मुझे शांति थोड़ी चाहिए मुझे,
दो घरों की लाज रखती, दो कुलों को है चलाती, एक
घर में भी जगह ना पाती, तभी तो नारी बेचारी कहलाती।
- प्रेम बजाज
जगाधरी ( यमुनानगर)
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