कैसा खेल यह वक्त ने रचाया है, था अच्छा खासा घर-परिवार, आज बेघर बनाया है ।
इंसा ने सताया जी भर के प्रकृति को, काटे पेड़ पौधे और जल को भी मुकाया है ।
समझाया बहुत इंसान को, कि ना सताओ प्रकृति को, देखो लेने को बदला आज प्रकृति ने भी कहर ढाया है।
घर से बेघर हो रहे लाखों कोई भूखा मर रहा, कोई प्यासा मर रहा, मैंने भी तो अपना आधा परिवार गंवाया है।
किया पलायन शहर से, गांव अपने जाने का ख्याल मन में आया है,
जा रहे हैं पैदल ही चलते हुए ना कोई बस ना कोई गाड़ी या टेंपो नजर आया है,
डर के मारे सब छुपे बैठे हैं घरों में सब, करोना ने ऐसा सबको डराया है ।
चल रहे भूखे-प्यासे कहीं कुछ नज़र ना आया है,
मासूम बेटी भूख से बिलख-बिलख कर मर गई पत्नी उसकी चिंता में खुद को गंवाया है।
एक निशानी बस बेटे को ही बचा पाया मैं, लेकर उसे हुआ घर से बेघर,
जिम्मेदारियों का बोझ लेकर कंधों पर चल पड़ा हूं नई मंजिल की खोज में,
ना जाने कहां ठिकाना होगा अब मेरा, ना जाने कहां ईश्वर ने अब मेरा डेरा लगाया है।
प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)
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