ऐ मौत ज़रा ठहर जा ज़िंदगी का क़र्ज़ चुकाना अभी बाकी है,
कुछ रूठे हैं, कुछ रिश्ते टूटे हैं, उन रूठों को मनाना अभी बाकी है।
इस ज़माने ने जी भर कर दिए ज़ख़्म मुझे, ना दर्द जाना मेरे ज़ख्मों का,
दिल भरा नहीं उनका अभी, मुझे थोड़ा और सताना अभी बाकी है।
कुछ नाकाम हसरतों में उलझी पहेली बन गई थी ज़िन्दगी ये मेरी,
जीवन की इस हुई उलझी पहेली को सुलझाना अभी बाकी है।
मेरे एतबार की हद, एक नज़र में दिल दे दिया और वो दिल्लगी समझते रहे,
बेइंतहा मोहब्बत करते हैं उनसे, ये राज़ उन्हें बताना अभी बाकी है।
किया था वादा हमने खुद से दिल-ए-बेताबी ना जग ज़ाहिर होने देंगे,
वो बेमुरव्वत रक़ीबों का बन बैठा, उसे अपना बनाना अभी बाकी है।
कुरेद कर मेरे ज़ख्मों को मेरी हर आह पर वो ठहाके लगाते रहे,
उनको आती है हंसी मेरे रोने पे, उन्हें थोड़ा और हंसाना अभी बाकी है।
बीमार-ए-ग़म का हाल ना पूछो, ज़ज्बे-पिनहा किसे कहें हम,
जान की बाज़ी हम हार चुके, इश्क की जंग में हराना अभी बाकी है।
बसर इस तरह से ज़िन्दगी की हमने, हर इक दर्द एक हादसा सा लगा,
मेरी नाकाम मोहब्बत पर ना हंसो यारो, प्रेम का अहसास कराना अभी बाकी है।
शब-ए-इंतज़ार में कटी *प्रेम* की उम्र सारी, नहीं अब रंज ज़िन्दगी से,
चौखट पे यार की दमे-आखिर होगा ये वादा निभाना अभी बाकी है।
बीमार-ए-ग़म ( इश्क का बीमार)
ज़ज्बे-पिनहा( छुपी हुई भावनाएं)
---प्रेम बजाज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X