आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल की ये आरज़ू

                
                                                         
                            दिल की ये आरज़ू
                                                                 
                            

दिल की ये आरज़ू थी कोई दोस्त प्यारा मिले
कहूं उससे दर्दे- दिल , मुझको भी सहारा मिले ।

अब तक भटक रहे थे इस बेदर्द जहां में हम
कोई ना अपना मिला जो मिले नागवारा मिले ।

हमने ना छोड़ी कसर अहदे-वफ़ा निभाने में
तोड़ते गए दिल जो भी मिले नाशुकराना मिले ।

तुझसे इश्क़ की आरज़ू में रहे ता-उम्र हम
ज़िन्दगी में रह गए कुछ पल अब यारा मिले ।

खामोश शहर , खामोश होने को है ज़ुबां हमारी
तुम्हारे आनेकी खुशी मनाएं या करें उलहाना -गिले ।

है आखिरी तमन्ना यही तेरी बाहों में निकले दम
सुकून - ए- ज़िन्दगी हमें भी तो एक बारा मिले ।

मौजु-ए-गुफ्तगु भी ना रहा अब तो कोई करते हैं दुआ
ग़र #प्रेम #को रफ़ीक मिले तो बेवफ़ा तुमसा ना मिले ।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर