अनकही सी प्रीत निभा
रही हूं
गीत युगों-युगों से उनके ही गुनगुना रही हूं
राह तक रही हूं अहिल्या सी
श्री राम बन आएंगे वो प्राण भरने
कभी तो बरसेंगे प्रीत के
बादल
बस सावन के फुहार को गगन तक रही हूं
कुछ ना कहकर निहारना
निहारकर कुछ ना कहना
एक प्यास अनन्त लगा बैठी हूं
उस मनमोहन की सूरत
मन में बिठा चुकी हूं
उसके अनकहे शब्दों से
प्रिया निखर रही हूं मैं।
"*प्रिती"प्रिया*"
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