अब मैं आगे बढूंगी
आँखें जो आंसुओं से डबडबाई थीं अब तक, उन्हें पोंछ धुंधलका दूर करूंगी
हाथों में जो हथकड़ी हैं मर्यादा के नाम की, उन्हें तोड थामूंगी उनमें विश्वास
पैरों की बेडी जो सीमित किए है दायरा मेरा, काट फेंकूंगी उन्हें और कदम बढाउंगी विस्तृत की ओर
मैं अपने पर संभालूंगी और निकल पडूंगी अनंत की सैर करने
क्योंकि मेरी ऊंचाइयां मुझे बुलाती हैं।
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