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जौहरी ही हीरे की कीमत लगा सकता हैं साहब

                
                                                         
                            सिक्के मैंने भी उछाले थे हसीनों की महफिल में
                                                                 
                            
तमाशबीन बन गया अपनी हीं दौलत लुटाकर ।
जब तक जेब नोटों से भरी थी वाह वाही का शोर था
सिक्कों की खनक फीकी पड़ी तो महफिल वीरान थी।

खामोश रहने का हूनर भी अपने पास रखा करो जनाब
सुना हैं हर बात का जवाब देने से मसले बिगड़ जाते हैं।
जहां पर जज्बातों की कोई कद्र नहीं होती जनाब
वहां शब्दों का कोई मोल नहीं रह जाता हैं।

तौलने वाले तो नजरों से हीं तौल लेते हैं साहब
तराजू तो सदियों से एक बहाना हैं।
चेहरे की उदासी तो आँखों से भी पढ़ी जाती है साहब
खत का मजमून तो एक बहाना है।

जौहरी ही हीरे की कीमत लगा सकता हैं साहब
किसी साहूकार के बस की बात नहीं है।
जो हीरा जौहरी के हाथों से तराशा गया हो
साहूकार उसकी कीमत लगा नहीं सकता।

यादों को संजोने की कला हमने भी सिखा था
रेत के महल बनाने का हूनर हमारे पास भी था।
कड़वी यादों का गुबार कुछ ऐसा फूटा
रेत के महल का कोई हिस्सा बचा नहीं पाया।

महफिल की ख्वाहिश हर किसी को है यहां
तन्हाई किसी को रस नहीं आती
जब दिल टूटता हैं महफिल में अपनों के ब्यंग्य बाणों से
हर शख्स सुकून तलाश करता है तन्हाई में।
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28 minutes ago

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