थोड़ी जमीन हमारी भी थी
थोड़ा हक हमारा भी था।
इन हवाओं में सांस लेने का अधिकार
कुछ तुम्हारा भी था , कुछ हमारा भी था।।
तुम फैलते गए, हम सिमटते गये
तुम आगे बढ़ते गए,हम पीछे हटते गए।
जंगलों को निशाना तुमने बनाया,इल्ज़ाम हम पर लगाए
नदियों का रुख तुमने मोड़ा,प्यासे हम तड़पते रहे।।
अनवरत बहती नदियों के जल पर
थोड़ा हक तुम्हारा भी था,थोड़ा हक हमारा भी था।
हक की परिभाषा तुम भूलते गए
अधिकार क्या होता हैं, हमें कभी ज्ञात हीं न था।।
नए नए शहर बसाते गए हमारे महफूज ठिकानों पर
विकास के नाम पर बुलडोजर चलवाए हमारे आबाद आशियानों पर।
हमने शहर का पता क्या पूछ लिया ,गोलिया चलवाई हमारे ऊपर
आदमखोर का तमगा देकर शिकारियों को छोड़ा हमारे ऊपर।।
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