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मानवता ही मानवता को मिटाने चली

                
                                                         
                            मानवता ही मानवता को मिटाने चली,
                                                                 
                            
रुदन- क्रंदन अफगान की हर इक गली।
सुपर पॉवर का जो तमगा लिए थे,
भगोड़ों की कतार में पहले खड़े थे।
दमदार किरदार, असलियत दागदार निकला,
काम कम जुमला भी झागदार निकला।
सत्ता हथिया ली हथियारों की नोकों पर,
नाटो भी नाटा निकला जिहादी मंसूबों पर।
अफगानी दो - चार दिन ही लड़े होते,
तो शायद अपने सरजमीं पर खड़े होते।
खुद की लड़ाई खुद लड़नी होती है,
दूसरों के भरोंसो पर ह्रस यही होती है।
कितने मासूम मरने को मजबुर हुए,
भाग रहें है इधर - उधर अपनों से दूर हुए।
तालिबान को मिल रहा समर्थन कितनों से?
अंदेशा होता क्यूं पटकथा लिखी थी महीनों से?
महाशक्तियां थी जितनी सबने पल्ला झाड़ लिया,
विश्वगुरु बनने वाला भी बोरिया - बिस्तर बांध लिया।
अभिव्यक्ति की आजादी वाले कुछ तो बोल होते,
बंद जुबानों के अपने ताले तो खोले होते।
 
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4 वर्ष पहले

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