मात भवानि कृपामयि हो तुम, दानव को रण बीच गिराओ।
आस लिए सब दास खड़े दर, दीन जनो पर प्रेम लुटाओ॥
मात सदा सब पाप मिटा कर, दुष्ट अनीति समूल जलाओ।
सेवक साधक सत्य सनातन, साथ सदा सब पार लगाओ॥१॥
रौद्र विनाशक रूप धरो अब, नारि उठो निज खड्ग उठाओ।
मानव वेश छिपे शठ दानव, हाथ उठें जब शीश उड़ाओ॥
चण्डि समान बनो तुम भी अब, क्रूर पिशाच समूल मिटाओ।
न्याय करो निज शक्ति जगा कर, पातक को यम लोक पठाओ॥२॥
भीतर भामिनि शक्ति निवासिनि, भाव भयंकर आज जगाओ।
मूरति मानव मात्र न हो तुम, मर्दित दानव मुण्ड सजाओ॥
पाप विनाशक शक्ति शिवे तुम, काल कराल कृपाण चलाओ।
व्यापक विश्व विहारिणि वैभवि, पावन नूतन लोक रचाओ॥३॥
- प्रत्यूष गौतम
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