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बीते कल से आगे

                
                                                         
                            बीते कल से आगे
                                                                 
                            

किस चीज़ के पीछे भाग रहे हैं हम,
जो गुज़र गया, जो खो गया…
उसी के पीछे क्यों ठहरे हैं हम?
ज़िंदगी हर रोज़ नया सबक़ सिखाती है,
मगर हम बीते कल की ख़ामोशी में
अपने आज की साँसें तक भूलते जाते हैं।
कभी पेड़ों की छाँव थी,
कभी नदियों का पानी साफ़ था,
कभी हवा में सुकून था—
आज वही प्रकृति हमसे सवाल करती है।
जो खो चुका, उसे हर बार लौटाया नहीं जा सकता,
मगर जो बचा है, उसे सँभाला ज़रूर जा सकता है।
कल की ग़लतियों का अफ़सोस करने से बेहतर है
आज एक पेड़ लगाएँ, एक नदी बचाएँ,
और अपनी धरती के लिए कुछ कर जाएँ।
कुछ चीज़ें सिर्फ़ याद रखने के लिए नहीं,
संभालकर रखने के लिए होती हैं।
कल से सबक़ लो,
मगर आज को यूँ मत गँवाओ—
कि आने वाली पीढ़ियाँ
हमारे आज को सिर्फ़ एक अफ़सोस की तरह याद करें।
~ प्रतीक्षा शुक्ला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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