ये मनुष्य तेरा ऋणी..
तू शक्ति तू धरणी !
हर जीव में समाई
जब प्रकृति मुस्काई
तू है जननी !
तू शक्ति तू धरणी !!
चन्द्रमा माथे पर दमके,
पहनकर तू फूलों की वेणी,
आभूषण तेरी चमके..
जैसे अंधकार में कोई दामिनी,
तू है जननी!
तू शक्ति तू धरणी !!
तेरे अंचल में जन्मी..
सभ्यता पुरानी,
अपने कोख से रची..
तुने जन जन की कहानी,
तू जननी!
तू शक्ति तू धरणी!!
कई बार उजाड़ी जाती,
वेदना सारी सह जाती,
ज्वालामुखी भीतर रख..
फिर सृजन कार्य में जुट जाती,
मनुष्य के सुख दुख की संगिनी,
तू जननी !
तू शक्ति तू धरणी !!
तेरे सब्र का बांध जब टूट जाए..
रौद्र रूप तेरा दिख जाए,
कहीं बाढ कहीं भूकम्प आए,
ये जग करे नतमस्तक..
तेरे आगे जननी !
ये मनुष्य तेरा ऋणी..
तू शक्ति तू धरणी !!
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