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वो छत पर क्या कर रही है?

                
                                                         
                            वो छत पर क्या कर रही है ?
                                                                 
                            

इतनी रात को वो अकेली,
छत पर क्या कर रही है ?
जुल्फ बिखरी,
ऑखे कजरारी,
चंचल अदाये लिए
वो किसका इंतजार कर रही है ?
इतनी  रात को वो अकेली,
छत पर क्या कर रही है ? 

खफा-खफा तो नहीं मगर खुशनुमा भी नहीं लग रही है... 
परेशान है,
तो क्या परेशानी में वो अपनी जुल्फे सँवार रही है, या
ये उसकी अदा है जो वो हमें देखा रही है !
इतनी  रात को वो अकेली,
छत पर क्या कर रही है ? 

सब सो गए मगर वो जग रही है
न जाने किस का सपना निगाहो में पिरो रही 
बडे दूर से उसे  देख कर सोच रहा हूँ  , कि 
इतनी  रात को वो अकेली,
छत पर क्या कर रही है ?

प्रशांत कुमार संजय*



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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