चले गये
सज कर आए और लुभाकर चले गये
वो हमको दीवाना बनाकर चले गये
क्या गुनाह था इन निगाहो का
जो इनको इक ख़्वाब दिखाकर चले गये
बाँहों में आए और नहीं भी
वो हमसे दामन छुड़ाकर चले गये
आज भी निगाहे शर्म से झुकी है
ख़ुद को खोया और मुझे पाकर चले गये
सज कर आए और लुभाकर चले गये
वो हमको दीवाना बनाकर चले गये
प्रशांत कुमार संजय*
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