नारी, शक्ति से वज्र बना लो,
खड़ग हाथ में धारो तुम।
ना द्रोपदी बन कृष्ण की राह तको,
दुर्गा बनके हुंकारों तुम, दुर्गा बनके हुंकारों तुम।
ये दुर्योधन की महफिल हैं
धृतराष्ट्र ही राज चलाएगा
दुश्शासन के हाथो से,
आंचल को खींचा जाएगा
तुम चीखों या चीत्कार करो
तुम्हे तनिक सुना ना जाएगा
इन राजनीति के खेलो में
इंसाफ कहां मिल पाएगा?
अब खुद ही उठो, तुम खुद ही लड़ो,
लाचारी को अब मारो तुम।
ना द्रोपदी बन कृष्ण की राह तको,
दुर्गा बनके हुंकारों तुम, दुर्गा बनके हुंकारों तुम।
नहीं कोई शक्ति तुम सी,
तुम ही शक्ति का कारक हो
तुम ही जग को जीवन देती,
तुम ही बालक कि पालक हो।
तुम आशुतोष की अर्धांगी
तुम महाकाल को वरती हो।
तुम ही सोम कि आभा हो
तुम ही गंगा, तुम धरती हो।
विकृत समाज के हाथो से,
अपना अभिमान ना हारो तुम।
ना द्रोपदी बन कृष्ण की राह तको,
दुर्गा बनके हुंकारों तुम, दुर्गा बनके हुंकारों तुम।
सृष्टि की तुम पालन करता
तुम मातृ शक्ति, करता धरता
संसार जन्म तुझसे पाता
फिर आप सिमट तुझमें जाता
तू ही अग्नि , तू ही भगिनी
तुम ही हो चराचर जगजननी।
सीता बन अग्नि पर ना चढ़ो
अपना अधिकार सम्हालो तुम।
ना द्रोपदी बन कृष्ण की राह तको,
दुर्गा बनके हुंकारों तुम, दुर्गा बनके हुंकारों तुम।
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