कई साल हो गए मुझको
ख़ुद से मिले हुए।
इन ज़िम्मेदारियों, इन ज़रूरतों के बीच
कहीं गुमशुदा सा हो गया हूँ मैं।
वक़्त मिला तो
मिलूँगा ख़ुद से कभी, पूछूँगा—
क्या सचमुच ऐसा ही था मैं?
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