बहती नहीं कोई गंगा-सी धारा,
यहाँ का कण-कण है खारा।
फिर भी मीठी रीत सदा,
कण-कण में बसती प्रीत यहाँ।
होता सेवन खारा पानी,
अधरों पर मीठी वाणी ।
सजती गीत-संगीत की होली,
नव निशा में गरबा की रंगोली।
तापी के अनुपम घाटों पर,
होती पावन अमृत-बेला।
रेशम का होता व्यापार यहाँ,
हीरों से सजता बाज़ार यहाँ।
संध्या सलोनी-सी सूरत,
भोर प्रभा-सी मूरत।
मेरा सूरत, प्रिय सूरत ।
— प्रांजल मौर्य ‘प्रखर’
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