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मिट्टी की गंध

                
                                                         
                            गीतों से न कोई नाता,
                                                                 
                            
फिर भी गीत सुनाता हूं।
गांवों का रहने वाला,
खेतों की बात दोहराता हूं।

संध्या मनोहर अनुपम बेला में,
धूलों के रज कण संग खेला मैं।
हर पगडंडी की एक कहानी थी,
मिट्टी की गंध वो मस्तानी थी।

गांवों का रहने वाला,
खेतों की बात दोहराता हूं।

खेतों में जो कटी जवानी,
फसलों पर छपी कहानी।
वर्षा की जो आस ले बैठा,
फसलों की लाश ले बैठा।

गांवों का रहने वाला,
खेतों की बात दोहराता हूं।

टूटी सांसें, बिखरे सपने,
रूठ गए थे मौसम अपने।
पर थकी चेतना ने झकझोरा,
माटी से कब टूटा नाता?

गांवों का रहने वाला,
खेतों की बात दोहराता हूं।

बूझते दीपक पास से देखा,
नवजीवन के प्रयास से देखा।
उम्मीदों का मिला उजाला,
कंधों पर फिर हल डाला।

गीतों से न कोई नाता,
फिर भी गीत सुनाता हूं।
गांवों का रहने वाला,
खेतों की बात दोहराता हूं।

-प्रांजल मौर्य 'प्रखर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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