रक्तिम जिस दिन घाटियां हुईं
सिंदूर बिखर गया पर्वत पर
सूनी, श्वेता हो गई माँग
भारत ललना के मस्तक पर
दिन मंगल, घटना अमंगल थी
वह 22 अप्रैल का, चैत्र मास
बासन्ती ऋतु में पहलगाम
की घटना, मर्माहत आभास
था कांप गया हम सब का हृदय
दुख में रोया पूरा भारत
मृत पड़े सामने थे शरीर
थे निरपराध, पर हत – आहत
सिंदूर के कण उड़ रहे आज
निर्मूल तुम्हें अब करने को
हे आतंकी! हे शत्रु पक्ष !
हो सावधान, फल भरने को
सिंदूर के कण आवेशित हो
चिंगारी बन कर उभरे हैं
हे, शत्रु दलों के आतंकी !
अब देख, मृत्यु के चेहरे हैं!
क्रोधाग्नि जगाया है तुमने
अब दाह तुम्हें होना होगा
निर्वंश करेंगे हम तुमको
या मरोगे या रोना होगा।
चल पड़ी काल बन कर सेना
भारत की, नहीं कुछ बोलेगी
पर मूक मृत्यु बन, डेहरी पर
कई खेल रक्त के खेलेगी।
सिंदूर का प्रत्याघात है यह
संत्रास हटाना ही होगा
हो गया है गुंजित पांचजन्य
अब “पाक” मिटाना ही होगा।
रक्तिम किया तुमने पहलगाम
छीना सिंदूर हमारा है
तुम्हें मूल्य चुकाना ही होगा
प्रतिशोध का प्रण ये, हमारा है।
- प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X