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चांदी, पीतल और सोना क्या?

                
                                                         
                            सीखो तुम प्रारब्ध झेलना,
                                                                 
                            
चुनौतियों से लड़ना सीखो।
हँस कर झेलो दुर्गम दुर्दिन,
बाधा पार कर बढ़ना सीखो।
बिन संघर्ष के जीवन कैसा,
विचलित इससे होना क्या?

मन का धीरज खोना क्या?
पौरुष होकर रोना क्या?

भीतरघाती जग हुआ सारा,
यहाँ-वहाँ ना मुखड़ा खोलो।
बनना सीखो तुम मेहनतकश,
बोलचाल में मिश्री घोलो।
मन में द्वेष-द्वंद्व को रखकर,
बीज काँटों का बोना क्या?

मन का धीरज खोना क्या?
पौरुष होकर रोना क्या?

जहाँ बौछारें हो खुशियों की,
तुम ना खोजो ऐसी महफ़िल।
यह दुनिया है बस एक मेला,
बिकता एक खिलौना है दिल।
रोज खेलते सब यहाँ दिल से,
जूली क्या और मोना क्या?

मन का धीरज खोना क्या?
पौरुष होकर रोना क्या?

कर्म भूमि यह जीवन सारा,
निष्ठापूर्वक काम किया कर।
सार सुखों का है संतुष्टि ही,
संग्रह पर ना ध्यान दिया कर।
सब मिट्टी में मिलना एक दिन,
चांदी, पीतल और सोना क्या?

मन का धीरज खोना क्या?
पौरुष होकर रोना क्या?
 
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50 मिनट पहले

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