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दोहा मुक्तक (ममता)

                
                                                         
                            चाहे कितने हो नगर,मां है मेरा गाँव।
                                                                 
                            
नापूं राहें रात-दिन,आते घर में पाँव।।
गर परिभाषित मैं करूँ,अपने मन का हाल।
तो जग तपती धूप है, ममता ठंडी छाँव।।

प्रज्ञा देवले 
3-6-24
(स्वरचित मौलिक)_
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2 वर्ष पहले

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