मोहब्बत में हैं इतना दम, ये लंका खोज लेते हैं
की समंदर पार बैठे हम, ये लंका खींच लेती है
की सोते हुए हनुमन को, जगाया था मोहब्बत ने
मोहब्बत की वह ज्वाला थी, लगाई आग लंका में
मोहब्बत में ख़लिश हो, तो मोहब्बत हो नहीं सकती
चाह जिस्मों की हो तो फिर, मोहब्बत हो नहीं सकती
मोहब्बत है दिलों से भी, मनों से हो नहीं सकती
मोहब्बत है सुलगती आंच, पर चलना सिखाती है
कभी लोगों को यह मीरा, कभी राधा बनाती है
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