मौत को भेजा यही पैग़ाम है
ज़िन्दगी ज़िन्दा दिली का नाम है
बाल बांका भी नहीं होगा कभी
जब दुआएं माँ की आठो याम है
तब्सिरा जबसे किया है हुस्न पर
बे-वजह शाइर हुआ बदनाम है
आपकी गहरी निगाहें बा ख़ुदा
झील कोई या छलकता ज़ाम है
फिर से तामील-ए-समन का है मिला
इश्क़ करने का लगा इल्ज़ाम है
जीते जी किसको मिला चैन-ओ-सुकूँ
कब दम-ए-रुख़्सत मिला आराम है
'दीप' रोटी बस यही है मसअला
पेट की खातिर ही क़त्ल-ए-आम है
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
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