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घुमड़ घुमड़ के भी बरसे न प्रीत के बादल चकोर अबकी बरस प्यासा ही रहा पानी

                
                                                         
                            निगाह-ए-गर्म में ठहरा है दर्द का पानी
                                                                 
                            
घरोंदा इश्क़ का टूटा तो बह गया पानी

मेरा तो सब्र-ओ-सुकुॅं खो गया कहीं यारो
किनारे तोड़ के दरिया का जब बहा पानी

लबों पे तिश्नगी छाई है धूप तीखी है
भटक के थक गया लेकिन नहीं मिला पानी

कोई हो स्रोत तो दरिया निकालूॅं सहरा में
नजूमियो से भी पूछा नहीं दिखा पानी

तेरी तलाश में भटका मिला न मयखाना
हलक की प्यास बुझाए न ओस का पानी

घुमड़ घुमड़ के भी बरसे न प्रीत के बादल
चकोर अबकी बरस प्यासा ही रहा पानी

जला है 'दीप' नई रोशनी दिखाएगा
बचाना इसको बुझा दे न ये हवा पानी
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
 
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39 मिनट पहले

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