समूचा दिन
कर चुकाकर अपना
हो गया था
निढाल अब दिनकर
लाल-नारंगी
बड़े गोले के रूप में
पड़ रहा था दिखाई
वह दूर से ही
लेकिन हो गई थी
उसकी तपिश अब कम
अस्त होने की मुद्रा में अब
आ चुका था दिनकर
जानता है वह
कि जगह-जगह पर
डूबता उसे देखने की
लग जाती है होड़
न केवल पर्यटकों में
बल्कि स्थानोय निवासियों
में भी
वैसे, उगते सूरज का
भव्य और मनभावन
दृश्य भी
होता नहीं कुछ कम
उदय और अस्त होना
सूर्य का
है प्रतीक इस धरती पर
जीवन का ही
जुड़ा हुआ है
जीवन के साथ ही
उदय और अस्त का चक्र
फिर करता है क्यों कोई
नाहक फ़िक्र।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X