तलाश, तलाश, तलाश और सिर्फ़ तलाश,
जीवन भर जीवन की ही तलाश।।
मौन को शब्द की, व्योम-पट को अब्द की,
मुक्त को आबद्ध की, गति को निस्तब्ध की।।
बूँद को सागर की, जुगनू को दिवाकर की,
नज़र को नज़र की, शून्य को शिखर की।।
ज़मीं को आसमाँ की, इंसाँ को इंसाँ की,
पंछी को उड़ान की, बेघर को मकाँ की।।
किसी को सपने की, किसी को अपने की,
जीवन भर जीवन की ही तलाश।।
राही को मंज़िल की, माँझी को साहिल की,
सुर को संगीत की, अंतर्मन को प्रीत की।।
सवाल को जवाब की, आँखों को ख़्वाब की,
मरुभूमि को नीर की, अभागे को तक़दीर की।।
कभी तपती धूप की, कभी शीतल छाँव की,
जीवन भर जीवन की ही तलाश।।
संसारी माया में सुख, सुख में ही शांति की,
मन के अंतर्द्वंद्व में मुखमंडल की कांति की।
बाह्य रोशनी में भीतर के प्रकाश की तलाश,
जीवन भर जीवन की ही तलाश।।
जब भीतर स्वयं से वाद-संवाद होगा,
अंतर्मन में साक्षीभाव का बोध होगा,
तब समझेंगे—जिसकी थी तलाश,
वह अपने ही भीतर,खुद का विश्वास।।
तलाश, तलाश और सिर्फ़ तलाश,
स्वयं से स्वयं तक की अनंत तलाश।।
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