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कोई भी न जाने मानव अंतर्मन की पीर

                
                                                         
                            कोई भी न जाने मानव अंतर्मन की पीर,
                                                                 
                            
भला कोई कैसे बताए अपना हृदय चीर।
आवरण में ढ़का हँसता मुस्कुराता चेहरा,
पर !सबके भीतर तो घाव हैं अति गंभीर।।

हर पल लुभाती है संसारी माया की जंजीर,
खोना-पाना को ही समझे अपना तकदीर।
जिसने समझा जीवन-मर्म, व्यथा का रहस्य,
वही बन गये गौतम, महावीर,नानक, कबीर।।

जीत सका न गति काल की कोई भी अमीर,
घास कुटिया में मस्त जीवन जीता फकीर।
बाजार की शोर में उलझा हुआ अशांत मन,
पर ! जीवन का सार—शील, संयम और धीर।।
- प्रदीप सोनसर्व "दीपाक्षर ...
 
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8 घंटे पहले

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