गाँव की स्मृतियाँ
अजीब होती हैं—
वे पुरानी नहीं होतीं,
बस चुप हो जाती हैं।
आज भी याद है
वह कच्चा आँगन,
बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू,
नीम से गिरती पत्तियाँ,
और माँ की वह आवाज़—
“बेटा, घर आ जा… शाम हो गई।”
तब घर लौटना
सिर्फ़ घर लौटना था,
आज समझता हूँ—
वह अपनी जड़ों में लौटना था।
माँ के हाथ की रोटी,
चूल्हे की आँच,
पीतल के बर्तनों की खनक,
और रात में छत पर
बिछी वह पुरानी खाट—
इन छोटी-छोटी चीज़ों में
एक पूरा संसार बसता था।
हम बड़े होते गए,
गाँव पीछे छूटता गया,
पर सच तो यह है—
गाँव पीछे नहीं छूटा,
हम अपने भीतर से दूर होते गए।
अब शहर की रोशनियों में
जब मन थक जाता है,
तो आँखें बंद करते ही
वही मिट्टी मिलती है,
वही आँगन मिलता है,
और माँ मिलती है।
फिर समझ आता है—
इंसान चाहे जितनी दूर चला जाए,
उसकी आत्मा का रास्ता
हमेशा उसी घर तक जाता है
जहाँ माँ ने पहली बार
उसे पुकारा था।
और जब स्मृतियों की
सारी आवाज़ें थम जाती हैं,
जब शहर भी चुप हो जाता है,
तब भीतर कहीं
गाँव की वही साँझ उतरती है…
और उस ख़ामोशी में
आज भी माँ की आवाज़ आती है—
“बेटा… बहुत देर हो गई,
घर आ जा।”
मैं आँखें खोलता हूँ—
माँ कहीं नहीं होती…
पर मेरी आत्मा
फिर भी घर लौट आती है।
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