आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भावों की रिमझिम बारिश

                
                                                         
                            उमड़ घुमड़ के आया बादर।
                                                                 
                            
भावों की भई रिमझिम बारिश।
आयेव साहित्य को पूर,
मातृभाषा को संकट भयेव दूर।।

उमड़ घुमड़ के आया बादर।
भावों की भई धुआंधार बारिश।
आयी साहित्य की बाढ़,
मातृभाषा को संकट गयेव पराय।।

उमड़ घुमड़ के छाया ढग।
देखन लग्या टक लगायके सब।
छायेव समाज मा उल्लास,
भयेव मातृभाषा को विकास।।

उमड़ घुमड़ के गरज्या बादल।
गर्जन लक युवा भया सावध।
लगाईन आपली लेखनी ला धार।
गलंड गयेव भाषिक संकट को पहाड़।।

उमड़ घुमड़ के आयी बदली।
बहती हवा की दिशा बदली ।
गूंजन लग्या मातृभाषा का स्वर।
मातृभाषा को सम्मान बढ़ेव भर भर।।

उमड़ घुमड़ के आया बादल।
लगातार भयी जोरदार बारिश।
छायी धरा पर जित् उत् खुशहाली।
आयी पोवारी साहित्य मा हरियाली।।

उमड़ घुमड़ के आया बादर।
भया स्वजन सब आश्चर्यचकित।
देखता देखता आयी मौसम मा बहार।
मातृभाषा को भयेव धुआंधार प्रचार।।

-ओ सी पटले
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर