आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सच की सादगी

                
                                                         
                            सादगी से बोला था जो सच सुना नहीं
                                                                 
                            
तमाशा करता झूठ भी दस्तूर हो गया
मेहनत के पसीने से बू आने लगी उनको
मक्कारी का इत्र इतना मशहूर हो गया
सादगी से बोला था जो सच सुना नहीं
तमाशा करता झूठ भी दस्तूर हो गया
मैं बाजार मे हूूूं तो बिकाऊं न समझना
उसूलों की चमड़ी खुद्दारी का लहू लिए हूूूं
गुरूर उतना ही अब भी न टूट पाने का
शीशे सा दिल फिर भी चकनाचूर हो गया
सादगी से बोला था जो सच सुना नहीं
तमाशा करता झूठ भी दस्तूर हो गया   


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर