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बरखा रानी

                
                                                         
                            अब के बरस सावन में, ना आई बरखा रानी,
                                                                 
                            
सूख रहे हैं धरती मानव, आस लगाये बरसे पानी 
हर सावन जब उमड़ घुमड कर काले बादल आते थे,
खेतों में हरियाली होती , जंगल में मोर नाचते थे 
कहाँ गए वो दिन जब दादुर शोर थे,
चौक चौबारे गली मोहल्ले घूम नहाते थे 
आज तो सूरज कहर ढा रहा कर रहा अपनी मनमानी 
सूख रहे है धरती मानव आस लगाये बरसे पानी 
सच पूछो तो इसमें कोई दोष नहीं है बरखा का,
ये फल है इंसानी कार्मों का जो हनन कर रहे निर्दोष जंगलों का 
वृक्ष लगाओ जीवन बचाओ संकेत है बरखा रानी का,
सूख रहे हैं धरती मानव आस लगाये पानी का 

Pooja yadav

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7 वर्ष पहले

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