मैं हूूूं वसंत सा अल्हड़ वल्हड़
कभी मैं सावन सा मनभावन भी
मुझमे ही बसते है राम अवध के
मुझमे ही है लंका के रावण भी
कभी तीर निराशा से बिध जाऊं
कभी बन दीपक उमंग का मुस्काऊँ
कभी नवजीवन की आशा है मुझमे
कभी विकट मृत्यु सा सोग मनाऊं
मैं हूूूं वसंत सा अल्हड़ वल्हड़
कभी मैं सावन सा मनभावन भी
कभी बालक सी अभिलाषा मुझमें
कभी धर मेेें पौरुष शौर्य दिखलाऊँ
पाप कर बनूूूं पापी कभी मैं पवन भी
मैं हूूूं वसंत सा अल्हड़ वल्हड़
कभी मैं सावन सा मनभावन भी
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