खंजर भी वफ़ा कर जाते हैं
जब अपने ही उन्हें चलाते हैं
चीर देते है एक ही वार में
फिर अपनों के लहू से नहाते हैं
खंजर भी वफ़ा कर जाते हैं
न ज़ुबान से ही चीख़ निकलती है
न कुछ दर्द बिलखने देता है
जब अपना ही कोई जख्म लगाए
हम आप वजह बन जाते हैं
खंजर भी वफ़ा कर जाते है
आंखें भी यूँ दगा दे जाती है
न उनसे से नज़र मिलती है
क़त्ल होती है बड़े इत्मीनान से
ऐसे कातिल को निहारे जाते हैं
खंजर भी वफ़ा कर जाते हैं
जब अपने ही उन्हें चलाते हैं
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