चंचल है यह हिन्दी इतनी
मन को कितना भाती है,
रग- रग में, नस-नस में
बहती जैसे निर्मल पानी है||
दर्पण जैसी सुदंर इतनी,
विश्व में छा जाती है
मयार्दा सिखाती हिन्दी,
मातृभाषा में लीन हो जाती है|
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