शिक्षिका
कक्षा में प्रवेश करती हूँ,
मानो,
ऐसा लगता है कि-
चुप पड़ी हुई श्यामपटों पर
भोर उतर आई है;
नन्हीं आँखों जैसी कठपुतलियों में
अनगिनत दिशाएँ उग आई हैं।
उन चंचलता से भरे मन में-
प्रश्नों का जंगल,
किसी हृदय में संकोच का कुहासा,
किसी हथेली पर अधूरा सपना है-
मैं,
शब्दों की धूप लिए
धीरे-धीरे उनके पास जाती हूँ,
और बंद खिड़कियों में
हवा की राह बनाती हूँ।
किताबों के अक्षर
केवल,
पन्नों पर ठहरे न रहें,
वे सोच बनें,
विवेक बनें,
और कठिन समय में
मनुष्य के साथ खड़े रहें।
मैं कुम्हार नहीं
कि
हर आकृति
अपनी इच्छा से गढ़ दूँ;
मैं तो बस इतना करती हूँ-
मिट्टी को उसकी
संभावित सुंदरता
पर,
विश्वास दिलाती हूँ।
कभी कठोर स्वर बनकर
गलत राह से वापस बुलाती हूँ,
कभी काँपते कदमों के नीचे
अपना विश्वास रख जाती हूँ।
हार के क्षण में कहती हूँ-
“ठहरो मत,
रास्ते समाप्त नहीं हुए हैं”;
और जब सफलता सामने हो,
तो धीरे से याद दिलाती हूँ-
“ऊँचा उठना अच्छा है,
पर मनुष्य बने रहना
उससे भी ऊँचा है।”
मेरे लिए परिणाम-
पत्र,
सिर्फ अंकों की पंक्तियाँ नहीं-
उनके पीछे कितनी रातें,
कितने आँसू,
कितनी कोशिशें
और कितनी
चुप जीतें होती हैं।
जब कोई शिष्य एक दिन
मेरे सामने खड़ा होकर कहता है-
“मैडम,
अब मुझे अपने ऊपर भरोसा है,”
तब लगता है,
मेरी आवाज़ ने
किसी के भीतर बंद पड़ा
एक दरवाज़ा
खोल रहा है।
मुझे फूलों के हार नहीं
चाहिए,
न नाम किसी पट्टिका पर;
मेरी खुशी तो तब है
जब मेरे शिष्य की वाणी में सत्य,
उसके निर्णय में विवेक,
और
उसके व्यवहार में करुणा दिखाई दे।
मैं रोज़ भविष्य को पढ़ाती हूँ-
वह भविष्य
जो अभी
इन छोटी-छोटी हथेलियों में है;
और हर शाम लौटते हुए
मन में-
यही विश्वास रखती हूँ-
शायद मेरी कक्षा से,
निकला कोई एक मनुष्य
किसी और के
अँधेरे में-
रास्ता बन जाएगा।
यही मेरी साधना है,
यही मेरा सम्मान-
किसी पद से नहीं,
किसी पुरस्कार से नहीं,
बल्कि,
अपने शिष्यों के भीतर
जीवित रह जाने का नाम है-
शिक्षिका होना।
-अलका यादव
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