हम हो सकते थे शून्य से संसार
तुम्हारे बाद...
स्मृतियों के खंडहर में खड़ा हूँ, मैं
अस्तित्व पर लगते प्रश्नचिह्न की तरह
पूरा बंजर पूरा बीरान
सिर्फ भीतर नहीं...
गंगा घाट के उस पार,
तुम्हारे घर तक जाती सड़क पर
अब नहीं दिखते लटकते गौरैया के घोसले
शायद अब गौरैया वहां नहीं रहती,
या किसी ने उजाड़ दिए उसके घर,
या शायद कोई लकड़हारा काट ले गया वो डाली
जिस तरह दुनिया में हो रही हर घटना,
किसी पूर्व घटना की ही परिघटना है..
मुझे लगता है,
एक तुम्हारे ना होने से फैला वीरान,
सबके लिए पसरा हुआ है लंबा अशांति का काल
एक तुम्हारे ना होने से जैसे कि
सिमट गया हो सृष्टि का स्पंदन।
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