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थोड़ी से गुंजाइश

                
                                                         
                            हम दोनों अब
                                                                 
                            
एक-दूसरे को छिपकर ही देखते हैं,
जैसे क्षितिज के उस पार
उमड़ते समंदर को
कातर निगाह से देखता है कोई चातक।

मुझे लगता है,
जाने के बाद भी
बची रहनी चाहिए थोड़ी-सी गुंजाइश—

ठीक उतनी,
जितनी बची रहती है
कटे हुए ठूँठों में
फिर से उग आने की।

भले ही
हम जुड़वा बरगद के पेड़ न बन सकें,
फिर भी अपनी-अपनी शाखें
फैलाए रखेंगे—

उस दिन के इंतज़ार में
जब फिर जुड़ सकें,
बिखरे हुए को समेट सकें,
अधूरे को पूरा कर सकें
और लिख सकें
आख़िरी अध्याय।

कम-से-कम
इतनी गुंजाइश तो रहे...

~प्रसून
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3 घंटे पहले

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