नक्सली हो या नक्सलवादी,
दोनों ठीक नहीं,
ये बात समझ में आती है,
पर इससे बड़ा सवाल यह है
कि उन्हें बनाया किसने?
कोई बच्चा
जंगल की गोद में पैदा होकर
बंदूक का सपना नहीं देखता,
उसे मिट्टी चाहिए,
उसकी नदी चाहिए,
उसका ही जंगल चाहिए,
उसी पर उसकी रोटी टिकी है,
उसी में उसके पुरखे सोते हैं..!
पर जब स्कूल की जगह
कैम्प बन जाए,
जब दवा की जगह
धौंस आ जाए,
जब जंगल के नाम पर
काग़ज़ी समझौते
और कॉरपोरेट की बोली
घुस जाए,
तो सवाल उठना ही है,
किसके मन में पाप पनप रहा है?
किसने आदिवासी को
उसकी ही विरासत से बेदखल किया?
किसने सरना के पेड़ों को
“प्रोजेक्ट” बता कर काटा?
किसने पहाड़ को खदान बनाया
और नदी को मलबे में दबा दिया?
नक्सलवाद जंगल से नहीं आता,
ये अन्याय की छाया से जन्म लेता है,
जहाँ सरकारी तंत्र
कानून की आड़ में
मिट्टी को ही इल्ज़ाम बना दे,
वहाँ गुनाहगार
हमेशा बंदूक वाला नहीं होता,
कई बार फ़ाइलें चलाने वाला भी होता है..!
जल, जमीन, जंगल का विनाश
महज लापरवाही नहीं,
एक पूरी व्यवस्था की
सोची–समझी बेदर्दी है,
और जब बेदर्दी हद पार करती है,
तो जंगल जवाब देना सीख जाता है..!
इसलिए सवाल
नक्सली कौन है
ये नहीं,
सवाल यह है कि
जंगल को उसकी माँ से किसने अलग किया?
आदिवासी की विरासत को
सौदे में किसने बदला?
और विकास के नाम पर
किसने विनाश की परतें चढ़ाईं?
सच तो यही है,
जंगल ने कभी हिंसा नहीं माँगी,
उसने हमेशा सिर्फ़
अपनी मिट्टी की इज़्ज़त माँगी..!
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