दशहरा :विजय का शाश्वत स्वर
चेतना के जागरण का महापर्व है दशहरा,
मानवता के उत्कर्ष का नवपर्व है दशहरा।।
अंतर के अंधकार पर प्रकाश का प्रहार है,
हर दुर्बलता पर दृढ़ संकल्प की पुकार है।
काम, क्रोध, मद, लोभ से संघर्ष का सार है,
अपने ही अंतर्मन पर विजय का अधिकार है।।
असत्य के आवरण पर सत्य का प्रहार हो,
अधर्म के हर पथ पर धर्म की ललकार हो।
अहंकार का क्षय हो, विनम्रता का विस्तार हो,
मर्यादा और सदाचार का जीवन में संचार हो।।
विपदाओं में धैर्य, कर्मों में अनुशासन रहे,
कर्तव्य-पथ पर संकल्प सदा अडिग रहे।
हर परिस्थिति में समभाव का व्यवहार हो,
जीवन के हर क्षण में दिव्यता का संचार हो।।
यह केवल पुतलों के दहन का उत्सव नहीं,
यह भीतर के रावण के क्षरण का पर्व है।
यह केवल विजय की उद्घोषणा नहीं,
यह आत्म-विजय के वरण का पर्व है।।
जहाँ सत्य हो, वहाँ विश्वास का प्रकाश हो,
जहाँ धर्म हो, वहाँ जीवन का उल्लास हो।
जहाँ करुणा हो, वहाँ मानवता का श्रृंगार हो,
जहाँ संयम हो, वहाँ व्यक्तित्व का निखार हो।।
समग्र चेतना का शाश्वत गान है दशहरा,
जीवन-मूल्यों का दिव्य विधान है दशहरा।।
धैर्य और अनुशासन की विजय का परचम है,
मानव के भीतर छिपे देवत्व का अभिनंदन है।
हर मन का रावण आज पराजित हो जाए,
हर हृदय में रामत्व पुनः प्रतिष्ठित हो जाए।
तम का अंत हो, नवप्रभात का उदय हो,
हर जीवन में सत्य, शिव और सुंदर की विजय हो।।
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