ज़िन्दगी वार दी फिर भी मिली रुसवाई ही
उड़ गए पंछी रही साथ में तन्हाई ही
दुनिया में आज बुजुर्गों की नहीं है कोई पूछ
जिसकी थी पूछ नहीं वो रही बरनाई ही
वक़्त बच्चों के नहीं पास है उनकी खातिर
है डराती उन्हें ख़ुद की सदा परछाईं ही
दर्द तन्हाई का झेला है बुज़ुर्गों ने आज
दर्द-ओ-तन्हाई से है उनकी शनासाई ही
उनको इस दर्द से बाहर हमें ही लाना है
समझे कोई तो कभी दर्द की गहराई भी
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